विदेशी नौकरी छोड़, सहरसा के विकास मॉडल के ब्लू प्रिंट के साथ जाप से रंजन प्रियदर्शी मैदान में, जाने सहरसा को लेकर क्या है योजना

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सहरसा विधानसभा अपने चुनावी रंग में रंग चुका है। सभी दलों के प्रत्याशी अपनी अपनी कैडर और वोट बैंक के बदौलत अपनी जीत सुनिश्चित करने में लगे है। कई पुराने चहरे चुनावी मैदान में है तो कई ऐसे नेता भी है टिकट नही मिलने पर निर्दलीय ही मैदान में है। पप्पू यादव ने सहरसा विधानसभा सीट से साफ छवि और शिक्षित उम्मीदवार को उतारकर एक सहरसा विधानसभा में मतदाताओं को यह संदेश देने में जुटे है कि अब राजनीति में बदलाव का समय आ गया है। सहरसा(75) से उम्मीदवार रंजन प्रियदर्शी जन अधिकार पार्टी (लो.) के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष है और शिक्षित होने के साथ साथ सामाजिक क्षेत्रो में कार्य करने का बेहतरीन अनुभव भी है। जेएनयू से स्नातक रंजन प्रियदर्शी रूस के एक मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत रहे है। अपने शहर की दुर्दशा और सहरसा को एक नई पहचान दिलाने के मकसद से सहरसा आ गए और विगत कई वर्षों से ग्रामीण और सामाजिक क्षेत्रों में कार्य कर रहे है। सहरसा(75) से उम्मीदवार रंजन प्रियदर्शी ने कहा कि उनका मकसद सिर्फ चुनाव लड़ना नही है बल्कि सहरसा की स्थिति को बदलना उनका मकसद है। सहरसा में बुनियादी सुविधाओं की घोर कमी है। गांव के लोग शहर नही आ पाते, सड़को की स्थिति खराब है। अगर किसी व्यक्ति को परेशानी हो तो वह अपनी परेशानी अपने जनप्रतिनिधि से नही कर पाता। स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी है। आखिर कब तक ऐसे हालात में हम जीते रहंगे यदि किसी मरीज की तबीयत ज्यादा खराब हो तो डॉक्टर दरभंगा या पटना रेफर कर देंते है। सहरसा में मेडिकल कॉलेज की स्थापना की जाएगी जहां विश्वस्तरीय सुविधा उपलब्ध होंगी। सहरसा में पिछले 30 सालों में राजद और भाजपा के प्रतिनधि रहे लेकिन सहरसा को देखकर लगता है कि यह अभी भी 50 साल पीछे है। कोई भी व्यक्ति बाजार जाता है तो आधा किलोमीटर जाने में 1 घंटे से ज्यादा समय लग जाता है। शहर का विस्तार हुआ और जनप्रतिनिधियों और राज्य सरकार जाम के मुद्दे पर खामोश रही और अब भी किसी भी पार्टी के नेता हो बंगाली बाजार ओवरब्रिज की समस्या पर खामोश हो जाते है क्योंकि वह जानते है अगर ओवरब्रिज बन गया तो राजनीति खत्म हो जाएगी। सहरसा में युवाओं के पास रोजगार नही है। कोशी में मखाना, मक्का, पेपर मिल, जुट आधारित उद्योग स्थापित की जा सकती है और जिलें को उद्योग नगरी में विकसित किया जा सकता है। पर्यटन के लिहाज से सहरसा को देव भूमि का दर्जा दिया जा सकता है जहां देश विदेश से श्रद्धालु सहरसा आ सकेंगे। रोजगार की कमी नहीं है साफ नियत की कमी है। यहां के जनप्रतिनिधि चुनाव जीतने के बाद लापता हो जाते है और पांच पांच साल तक जनता उन्हें ढूंढती रहती है। लोग सवाल नही करते इसलिए सहरसा पिछड़ा शहरों की सूची में है इसे बदलना है। देश के 10 सबसे गंदे शहरों से सहरसा को निकालकर इसे स्वच्छ और सुंदर सहरसा बनाना है।

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